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कविता संसार --- हिन्दी - उर्दू कविताओं का एक छोटा सा संग्रह।

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Wednesday, August 24, 2016

रचनायें आमंत्रित

कविता संसार एक ऑनलाइन कविताओं का संग्रह है | अभी तक यहाँ केवल हिंदी की ही रचनाएं ही प्रकाशित हुई हैं | परन्तु अब इसके विस्तार और सम्वर्धन के लिए हम केवल हिंदी ही नहीं उर्दू, हरयाणवी, पंजाबी और अग्रेज़ी का कॉलम भी बनाने जा रहे है | इस सम्बन्ध में कदम उठाते हुए हम आमंत्रित करते है इन सभी भाषाओँ के कवियों को कि वो अपनी रचनाओं की पहुँच बढ़ाने के लिए हमें भेजें | अंतिम तिथि 15 सितम्बर है \


हर रचनाकार केवल 3 - 10 रचनायें ही भेज सकता है |

पहली बार में प्रकाशित अधिकतम 5 ही होंगी

विषय में “कविता संसार में प्रकाशन हेतु” अवश्य लिखें

आप अपनी रचनायें निम्नलिखित माध्यमो से भेज सकते हैं :-

•    इमेल : admin@kavitasansar.com
•    स्पीड पोस्ट / कोरियर / साधारण डाक
   पता :     कविता संसार
          Rz-93, श्याम विहार
        पुराना खैरा रोड
        नजफगढ़, नई दिल्ली - 110043

कृपया साथ में अपना संक्षिप्त परिचय , उपलब्धियां, प्रकाशित काव्य संग्रह का नाम और एक फोटो अवश्य भेजें|

अधिक जानकारी के लिए आप दिए पते पर संपर्क भी कर सकते हैं


Thursday, January 14, 2016

ख़त लिखा उसने मुझे



ख़त लिखा उसने मुझे, ख़त में लिखा कुछ भी नहीं
जैसे अब लिखने लिखाने को बचा कुछ भी नहीं !
देर तक एक दूसरे साथ हम चलते रहे,
मैंने सब कुछ सुन लिया उसने कहा कुछ भी नहीं!
अक्स मेरा आईने में अब नहीं अब नहीं आता नज़र,
मेरे उसके दरमियाँ अब फासला कुछ भी नहीं !
इस तरह बैठा है तन्हाई का दामन थाम कर,
जैसे दीवाने का अब इसके सिवा कुछ भी नहीं !
हश्र के दिन भी मिरे हक में ही होगा फैसला,
जानता हूँ प्यार करने की सजा कुछ भी नहीं !
दिल लहू हो, तब ही जलता है हथेली पर चिराग़,
सब्ज़ पत्तों के सिवा वर्ना हिना कुछ भी नहीं !
मैं न कहता था, लकीरों की फकीरी छोड़ दे,
आखरिश देखा, लकीरों से बना कुछ भी नहीं !
मैंने देखा है बियाज़े जिंदगी को गौर से,
सब के हैं इसमें पते, मेरा पता कुछ भी नहीं !
हो अगर रौशन तो बन जाता है, सूरज रात का,
वर्ना ए “सीमाब” मिट्टी का दिया कुछ भी नहीं !

--सीमाब सुल्तानपुरी

Thursday, December 31, 2015

नववर्ष 2016 की शुभकामनाएं


कविता संसार की ओर से नववर्ष 2016 की शुभकामनाएं



Friday, November 6, 2015

मुझे मेरी मुहब्बत का, सिला मेरे सनम दे दो

मुझे मेरी मुहब्बत का, सिला मेरे सनम दे दो ।
मैं आदी हूं अश्कों का, मुझे सारे गम दे दो ।।

मैं तेरे वास्ते सारे, सितारे तोड़ लांउगा ।
जो तुम मुझको खुशी का एक, छोटा सा इलम दे दो ।।

मैं आशिक हूं मैं इंसानों से, थोड़ा सा जुदा सा हूं ।
संभल जाउंगा मैं दिलबर जो, थोड़ा अपनापन दे दो ।।

बहुत रिसते हैं ये जख्मे, जिगर जो तुमने दे डाले ।
इन्ही के वास्ते अब तो, मुहब्बत का मरहम दे दो ।।

मुहब्बत का हर एक आंसू,जाया हो नही सकता ।
किताबे इश्क लिखने को, हमें अश्क ए पुरनम दे दो ।।

तेरी चाहत में ये 'दिल ' दुनिया भूल बैठा है ।
तुम्हारा हो चुका हूं मैं , मुझे अब अश्क ए नम दे दो ।।

---------एच के शर्मा 'दिल'

Tuesday, October 27, 2015

गजल - इस कदर ना किसी को सताया करो।

इस कदर ना किसी को सताया करो।
वक्त पर तो कभी काम आया करो।।


बड़े मशरूफ़ हो हमने माना मगर,
कभी तो हम से मिलने आ जाया करो।१।


सामने हो तुम्हारे कोई कश-म्-कश,
हाल-ए-दिल हमको अपना सुनाया करो।२।


रहते हैं तेरे घर से जो कुछ दूर ही,
हाल माँ बाप का पूछ आया करो।३।


पहले झाँको तुम अपने  गिरेबान में,
उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो।४।


शायरी से ये घर चलने वाला नहीं,
मियाँ "राजीव" कुछ तो कमाया करो।५।


---राजीव पाराशर

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